श्रीरामरक्षास्तोत्रम्
श्लोक २२,२३,२४
Shloka 22,23,24![]()
रामो दाशरथि: शूरो लक्ष्मणानुचरो बली ।।
काकुत्स्तथ: पुरुषः पूर्ण: रघूत्तमः ॥ २२ ॥
वेदान्तवेद्यो यज्ञेश: पुराणपुरुषोत्तम : ।
जानकीवल्लभ: श्रीमानप्रमेयपराकम: ॥२३ ॥
इत्येतानि जपन्नित्यं मद्भकत: श्रद्धयान्वित: ।
अश्वमेधाधिकं पुण्यं सम्प्राप्नोति न संशय: ॥२४॥
| रामो दाशरथि: शूरो लक्ष्मणानुचरो बली | ||
| रामो | = | राम |
| दाशरथि: | = | दशरथ के पुत्र |
| शूरों | = | वीर |
| लक्ष्मणानुचरो | → | लक्ष्मण: + अनुचर: |
| लक्ष्मण: | = | रामानुज, सुमित्रानंदन |
| अनुचर: | = | अनुगामी हैं जिनके, (वे राम) |
| बली | = | बलवान् |
| काकुत्स्तथ: पुरुषः पूर्ण: रघूत्तमः | ||
| काकुत्स्थ: | = | ककुत्स्थ वंश में जन्म लेने वाले |
| पुरुष: | = | पुरोगामी, परमात्मा |
| पूर्ण: | = | सम्पूर्ण |
| कौसल्येयो | = | कौशल्या-पुत्र |
| रघूत्तम: | = | रघुकुल मे श्रेष्ठ |
| वेदान्तवेद्यो यज्ञेश: पुराणपुरुषोत्तम : | ||
| वेदान्तवेद्यो | → | वेदान्त: + वेद्य: |
| वेदान्त | = | वेदान्त ( उपनिषदों द्वारा) |
| वेद्य: | = | (जो) जानने योग्य हैं, (वे राम) |
| यज्ञेश: | = | यज्ञों का स्वामी |
| पुराणपुरुषोत्तम: | = | प्राचीन और श्रेष्ठ पुरुष |
| जानकीवल्लभ: श्रीमानप्रमेयपराकम: | ||
| जानकीवल्लभ: | = | सीताजी के प्रिय |
| श्रीमानप्रमेयपराक्रम: | → | श्रीमान् + अप्रमेय: + पराक्रम: |
| श्रीमान् | = | श्री से युक्त, श्रीयुत् |
| अप्रमेय: | = | ( जिनका) नापा न जा सके |
| पराक्रम: | = | शौर्य, बल |
| इत्येतानि जपन्नित्यं मद्भकत: श्रद्धयान्वित: | ||
| इत्येतानि | → | इति + एतानि |
| इति | = | ऐसे |
| एतानि | = | इनको |
| जपन्नित्यं | → | जपन् + नित्यम् |
| जपन् | = | जपता हुआ |
| नित्यम् | = | नित प्रतिदिन |
| मद्भक्त: | → | मत् + भक्त: |
| मत् | = | मेरा |
| भक्त: | = | भगत |
| श्रद्धयान्वित: | → | श्रद्धया + अन्वित: |
| श्रद्धया | = | श्रद्धा से |
| अन्वित: | = | युक्त |
| अश्वमेधाधिकं पुण्यं सम्प्राप्नोति न संशय: | ||
| अश्वमेधाधिकं | → | अश्वमेध: + अधिकम् |
| अश्वमेध: | = | अश्वमेध यज्ञ ( के पुण्य से ) |
| अधिकम् | = | अधिक |
| पुण्यम् | = | पुण्य को, शुभ कर्म को |
| सम्प्राप्नोति | = | भली भांति प्राप्त करता है |
| न | = | नहीं |
| संशय: | = | संदेह ( इसमें ) |
अन्वय
राम: दाशरथि: लक्ष्मणानुचर: बली काकुत्स्थ: पुरुष: पूर्ण: कौसल्येय: रघूत्तम: वेदान्तवेदद्य: यज्ञेश: पुराणपुरुषोत्तम: जानकीवल्लभ: श्रीमान् अप्रमेयपराक्रम: इति एतानि श्रद्धया अन्वित: नित्यम् जपने मद्भक्त: अश्वमेधाधिकम् पुण्यम् सम्प्राप्नोति संशय: न ।
भावार्थ
( इस श्लोकत्रयी में प्रभु राम कहते हैं कि ) राम, दाशरथि, शूर, लक्ष्मणानुचर, बली, काकुत्स्थ, पुरुष, पूर्ण, , कौसल्येय, रघूत्तम, वेदान्तवेद्य, यज्ञेश, पुराणपुरुषोत्तम, जानकीवल्लभ, श्रीमान,अमेय-पराक्रम — इन नामों को श्रद्धा के साथ प्रतिदिन जपता हुआ मेरा भक्त अश्वमेध यज्ञ करने से प्राप्त होने वाले पुण्य से भी अधिक पुण्य भलीभाँति प्राप्त करता है, इसमें सन्देह नहीं है ।
व्याख्या
( इस श्लोकत्रयी में प्रभु राम कहते हैं कि ) राम, दाशरथि, शूर, लक्ष्मणानुचर, बली, काकुत्स्थ, पुरुष, पूर्ण, , कौसल्येय, रघूत्तम, वेदान्तवेद्य, यज्ञेश, पुराणपुरुषोत्तम, जानकीवल्लभ, श्रीमान,अमेय-पराक्रम — इन नामों को श्रद्धा के साथ प्रतिदिन जपता हुआ मेरा भक्त अश्वमेध यज्ञ करने से प्राप्त होने वाले पुण्य से भी अधिक पुण्य भलीभाँति प्राप्त करता है, इसमें सन्देह नहीं है ।
तीनों श्लोकों की व्याख्या : श्रीरामरक्षास्तोत्रम् के २२, २३ व २४ वे श्लोक परस्पर गुँथे हुए हैं तथा एक साथ मिल कर अपने अभिप्राय को संपादित करते हैं । इन तीनों में श्रीराम के भिन्न-भिन्न नाम हैं और ये नाम स्वयं भगवान राम द्वारा कहे गये हैं । उनके द्वारा कहे गये ये नाम षोडशनाम भी कहलाते हैं । भगवान् राम कहते हैं कि मद्भक्त: अर्थात् ( जो ) मेरा भक्त मेरे इन पवित्र नामों का नित्य प्रतिदिन श्रद्धापूर्वक जप करता है, वह प्रचुर पुण्यों का भागी बनता है । हमारे शास्त्र अश्वमेघ यज्ञ से मिलने वाले पुण्यों की पुष्कलता का बखान करते है । प्रभु श्रीराम कहते हैं कि अश्वमेध यज्ञ से मिलने वाले पुण्यों से भी भी अधिक पुण्यों की प्राप्ति मेरे उस भक्त को होती है, जो इन नामों का श्रद्धासहित अनुदिन जप करता है । श्लोक २२-२३-२४ में प्रभु राम के वे सोलह नाम वर्णित हैं ।
सर्वप्रथम श्लोक २२ में बताये हुए नामों व उनसे निष्पन्न अर्थों को देखते हैं । ये नाम इस प्रकार हैं — राम:यानि राम, दाशरथि: अर्थात् दशरथपुत्र, शूर: यानि वीर, विक्रान्त । लक्ष्मणानुचर: अर्थात् लक्ष्मण अनुचारी हैं जिनके, वे राम । दूसरे शब्दों में कहें तो वे राम, जिनके पीछे-पीछे लक्ष्मण चलते हैं । लक्ष्मण उनका साथ कभी नहीं छोड़ते हैं और न हि उनकी आज्ञा का उल्लंघन करते हैं । भगवान राम उन्हें संकेत से भी कुछ कहते हैं तो भी वे बड़े भैया का मंतव्य समझ जाते हैं और तदनुरूप आचरण करते हैं । वे राम के प्रति समर्पित हैं । प्रभु श्रीराम को वे केवल बड़े भाई ही नहीं अपितु अपने आराध्य भी मानते हैं । राम के प्रति उनकी निष्ठा अतुलनीय है ।
श्लोक २२ में बताया गया प्रभु श्रीराम का अगला नाम है बली अर्थात् बलवान । इसके बाद के नाम हैं — काकुत्स्थ : अर्थात् ककुत्स्थ के वंश में जन्म लेने वाले, पुरुष: यानि परमात्मा पूर्ण: यानि सब प्रकार से पूरे, कौसल्येय: यानि कौशल्या के पुत्र और रघूत्तम: यानि रघुवंश में श्रेष्ठ ।
श्लोक २३ में प्रभु राम द्वारा कहे गये अगले नाम हैं — वेदान्तवेद्य: अर्थात् जो वेदान्त द्वारा वेद्य हों, जिन्हें उपनिषदों द्वारा जाना जा सकता है । उपनिषद् को वेदान्त कहते हैं । गोस्वामी तुलसीदास रचित रामचरितमानस के सुन्दरकाण्ड के आरंभ के पहले श्लोक में यह नाम आता है —
इसके बाद अगला नाम है यज्ञेश: अर्थात् यज्ञों के स्वामी, यज्ञपालक, यज्ञरक्षक । वे स्वयं ही यज्ञस्वरूप हैं । पुराणपुरुषोत्तम: का अर्थ है प्राचीन व श्रेष्ठ पुरुष । जानकीवल्लभ: से अभिप्रेत अर्थ है जानकी के प्राणप्रिय । श्रीमान् अर्थात् सदा श्री से युक्त और अप्रमेयपराक्रम: कहने से तात्पर्य है असीम पराक्रमी । अप्रमेय का अर्थ है, जिसे नापा न जा सके । अपरिसीम हो शौर्य जिसका, यह है अर्थ इस शब्द का ।
श्लोक २४ में वर्णित है कि ऐसे इन नामों को श्रद्धा से जपता हुआ मद्भक्त: अर्थात् मेरा भक्त अश्वमेधाधिकम् ( अश्वमेध +अधिकम् ) अर्थात् अश्वमेध यज्ञों भी अधिक पुण्य पाता है, इसमें संशय नहीं।
इन नामों की महिमा अपरिसीम है । लोक में कहावत भी है कि —
| श्लोक २१ | अनुक्रमणिका | श्लोक २५ |
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