श्रीरामरक्षास्तोत्रम्

श्लोक ३०

Shloka 30

माता रामो मत्पिता रामचन्द्र: ।
स्वामी रामो मत्सखा रामचन्द्र: ।
सर्वस्वं मे रामचन्द्रो दयालुर्नान्यं
जाने नैव जाने न जाने ॥३०॥

माता रामो मत्पिता रामचन्द्र:
माता = माँ
रामो = राम
मत्पिता मत् + पिता
मत् = मेरे
पिता = पिता
रामचन्द्र: = रामचन्द्र
स्वामी रामो मत्सखा रामचन्द्र:
स्वामी = मालिक, नाथ
रामो = राम
मत्सखा मत् + सखा
मत् = मेरे
सखा = मित्र, सखा
रामचन्द्र: = रामचन्द्र
सर्वस्वं मे रामचन्द्रो दयालुर्नान्यं
सर्वस्वम् = सब कुछ
मे = मेरा
रामचन्द्र: = रामचन्द्र
दयालुर्नान्यम् दयालु: + न + अन्यम्
दयालु: = कृपालु
= नहीं
अन्यम् = किसी और को
जाने नैव जाने न जाने
जाने = जानता (हूँ)
नैव न + एव
= नहीं
एव = ही
जाने = जानता (हूँ)
न जाने = नहीं जानता (हूँ)

अन्वय

रामो माता, रामचन्द्रो मत्पिता, रामो (मम) स्वामी, रामचन्द्रो मत्सखा, रामचन्द्रो मे सर्वस्वं दयालु:, अन्यं न जाने, नैव जाने, न जाने ।

भावार्थ

राम मेरी माँ हैं, रामचन्द्र मेरे पिता हैं । मेरे नाथ राम हैं । रामचन्द्र मेरे मित्र हैं । मेरा सब कुछ कृपालु रामचन्द्र हैं । किसी और को मैं नहीं जानता, नहीं जानता, नहीं ही जानता ।

व्याख्या

श्रीरामरक्षास्तोत्रम् के तीसवें श्लोक के अनुसार राम का अनुरागी साधक यह कहता है कि राम ही मेरी माता हैं व वे ही मेरे पिता हैं — माता रामो, मत्पिता रामचन्द्र: । वे ही मेरे मालिक अथवा नाथ हैं और मित्र भी वही हैं — स्वामी रामो मत्सखा रामचन्द्र: । सच तो यह है कि वे दया के सागर, वे परम कृपालु प्रभु राम ही मेरा सर्वस्व हैं ।

 

आगे बड़ी दृढ़ता से साधक का कहना है कि मैं और किसी को नहीं जानता, नहीं जानता और बस जानता ही नहीं — जाने नैव जाने न जाने । तात्पर्य यह है कि रामचन्द्र के अलावा मेरा न यहाँ कोई है और न ही मैं किसी और का हूँ । उन्हीं का मैं पुत्र, सखा व दास हूँ । उन्हीं को पूरी तरह समर्पित हूँ । यहाँ भी वही भाव लक्षित होता है, जो इस प्रार्थना में व्यक्त हुआ है —
त्वमेव माता च पिता त्वमेव । त्वमेव बन्धुश्च सखा त्वमेव ॥
— प्रार्थना (स्तोत्र)
श्लोक २९ अनुक्रमणिका श्लोक ३१

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