श्रीरामरक्षास्तोत्रम्
श्लोक ३१
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दक्षिणे लक्ष्मणो यस्य वामे च जनकात्मजा ।
पुरतो मारुतिर्यस्य तं वन्दे रघुनन्दनम् ॥३१॥
| दक्षिणे लक्ष्मणो यस्य वामे च जनकात्मजा | ||
| दक्षिणे | = | दाहिनी ओर |
| लक्ष्मण: | = | लक्ष्मणजी |
| यस्य | = | जिसके |
| वामे | = | बाईं ओर |
| च | = | और |
| जनकात्मजा | → | जनक + आत्मजा |
| जनक | = | राजा जनक (की) |
| आत्मजा | = | पुत्री |
| पुरतो मारुतिर्यस्य तं वन्दे रघुनन्दनम् | ||
| पुरतो | = | आगे, सामने |
| मारुतिर्यस्य | → | मारुति: + यस्य |
| मारुति: | = | पवनपुत्र (हनुमान) |
| यस्य | = | जिसके |
| तम् | = | उसको |
| वन्दे | = | वन्दन करता हूँ |
| रघुनन्दनम् | = | रघु के वंशज (राम) को |
अन्वय
यस्य दक्षिणे लक्ष्मण: च वामे जनकात्मजा यस्य पुत्र: मारुति: तं रघुनन्दनमं वन्दे ।
भावार्थ
जिनके दाहिनी ओर लक्ष्मण हैं व बायीं ओर जनकपुत्री सीता हैं तथा सामने वायुपुत्र हनुमान हैं, उन रघुवंश के नन्दन राम को मैं वन्दन करता हूँ ।
व्याख्या
श्रीरामरक्षास्तोत्रम् के इकत्तीसवें श्लोक में राघव राम को वन्दन निवेदित किया गया है । श्लोक के अनुसार जिनके दाहिनी ओर लक्ष्मणजी तथा बाईं ओर राजा जनक की पुत्री जनकात्मजा (सीताजी) शोभायमान हैं और सामने जिनके वायुनन्दन हनुमानजी (मारुति:) हैं, उन राम को मैं नमस्कार निवेदन करता हूँ । रामजी को यहाँ रघुनन्दन कहा गया है ।
नन्दन पुत्र या वंशज के अर्थ में प्रयुक्त होता है । वास्तव में इसका शाब्दिक अर्थ होता है नन्दित अथवा आनन्दित करने वाला । राम रघुवंश के वंशज हैं तथा रघुवंश में उत्पन्न होने से वे रघुवंश को आनन्द देते हैं । अतएव वे रघुनन्दन हैं । उन रघुनन्दन के चरणों में मेरा नमस्कार है, यह साधक की विनय है ।
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