श्रीरामरक्षास्तोत्रम्

श्लोक ३२

Shloka 32

लोकाभिरामं रणरंगधीरं राजीवनेत्रं रघुवंशनाथम् ।
कारुण्यरूपं करुणाकरं तं श्रीरामचन्द्रं शरणं प्रपद्ये ॥३२॥

लोकाभिरामं रणरंगधीरं राजीवनेत्रं रघुवंशनाथम्
लोकाभिरामम् लोक + अभिरामम्
लोक = लोगों / तीनों लोकों
अभिरामम् = को आनन्द देने वाले की
रणरंगधीरम् = युद्धभूमि में दृढ़ रहने वाले की
राजीवनेत्रम् राजीव + नेत्रम्
राजीव = कमल
नेत्रम् = नयन की
रघुवंशनाथम् रघुवंश + नाथम्
रघुवंश = रघुवंश
नाथम् = के नाथ की
कारुण्यरूपं करुणाकरं तं श्रीरामचन्द्रं शरणं प्रपद्ये
कारुण्यरूपम् कारुण्य + रूपम्
कारुण्य = करुणा
रूपम् = की मूर्ति की
करुणाकरम् करुणा + आकर
करुणा = दया के
आकर = निधान की
तम् = उन
श्रीरामचन्द्रम् = श्रीरामचन्द्र की
शरणम् = शरण
प्रपद्ये = लेता हूँ / ग्रहण करता हूँ

अन्वय

लोकाभिरामं रणरंगधीरं राजीवनेत्रं रघुवंशनाथं कारुण्यरूपं करुणाकरं तं श्रीरामचन्द्रं शरणं प्रपद्ये ।

भावार्थ

जो लोकसुहावन अथवा लोकमनोहर हैं, जो रणभूमि में दृढ़ता से डटे रहते हैं, कमलनयन हैं, रघुवंश के स्वामी हैं, करुणा की साक्षात् मूर्ति हैं और दया के निधान हैं, मैं उन श्रीरामचन्द्र की शरण ग्रहण करता हूँ ।

व्याख्या

श्रीरामरक्षास्तोत्र के बत्तीसवें श्लोक में कहा है कि मैं श्रीरामचन्द्र की शरण लेता हूँ । राम लोकाभिरामम् हैं । अभिराम का अर्थ सुन्दर भी होता है और सुखदायी भी । श्रीराम लोक के अर्थात् लोगों के मन को भाते हैं, सभी को सुहाते हैं । लोकप्रिय हैं वे । लोक का अन्य अर्थ भुवन भी है । अत: कह सकते हैं कि श्रीराम तीनों लोकों के मनभावन हैं । तीनों लोकों को सुख देने वाले हैं । अतएव उन्हें लोकाभिरामम् कहने से आशय यह है कि प्रभु श्रीराम त्रिभुवनसुन्दर हैं । ऐसे त्रिभुवनमनोहर श्रीराम की मैं शरण लेता हूँ ।

 

आगे कहा है कि रणरंगधीरम् राम की शरण लेता हूँ । रंग या रंगभूमि का अर्थ केवल नाटक या नृत्य-गान का रंगमंच ही नहीं है, अपितु रणभूमि भी रंगभूमि कहलाती है । इस रंगभूमि में जो दृढ़ता से डटा हुआ है, वह धीर-वीर पुरुष रणधीर है । श्रीराम का यह प्राकट्य उनकी एक लीला है, क्रीड़ा है । इस प्रकार से भी रंगभूमि का सन्दर्भ सिद्ध होता है । कुल मिला कर कहने का आशय यह है कि जो प्रभु राम लीला-नाट्य कर रहे हैं, वे रणभूमि में अडिग रहकर युद्ध में जुटे हैं । ऐसे संग्रामधीर राम की मैं शरण लेता हूँ ।

 

श्रीराम को स्तुतिगायक राजीवनेत्रम् कह कर पुकारते हैं । वे राजीव अर्थात् कमल जैसे नेत्रों वाले हैं । वे रघुवंशनाथम् अर्थात् रघुवंश के स्वामी हैं । वे कारुण्यरूपम् हैं अर्थात् वे साक्षात् करुणा की मूरत हैं । उन्हें करुणाकरम् कह कर भी पुकारा । यह शब्द करुणा व आकर इन दो शब्दों के योग से बना है । आकर का अर्थ होता है निधि, खान अथवा किसी वस्तु की बहुलता । श्रीराम को करुणाकरम् कह कर पुकारा है, क्योंकि वे करुणा के निधि हैं, दया के सागर हैं । आकर से बने हुए शब्दों के कुछ उदाहरण हैं — गुणाकर, शोभाकर, पुष्पाकर आदि, जिनका क्रमश: अर्थ है गुणों के भण्डार, शोभा से भरपूर, वसन्त ऋतु जिसमें पुष्पों की बहुलता होती है । प्रभु श्रीराम उपर्युक्त सब गुणों से समृद्ध हैं और उन्हीं श्रीराम की शरण मैं ग्रहण करता हूँ ।

 

कुल मिला कर इस श्लोक से यह अभिप्राय ध्वनित होता है कि मैं लोकसुहावन, संग्रामधीर, पद्मलोचन, करुणामय, दयानिधान, रघुनाथ रामजी की शरण को प्राप्त होता हूँ । वे ही मेरे शरण अर्थात् आश्रय हैं । शरण में जाने का अर्थ होता है शरणागति लेना, किन्तु वे मेरे शरण हैं, इसका स्पष्ट अर्थ है वे मुझे शरण प्रदान करने वाले हैं अर्थात् मेरा सहारा हैं, मेरा आश्रय हैं, मैं केवल और केवल उनके सहारे हूँ ।
श्लोक ३१ अनुक्रमणिका श्लोक ३३

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